जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन: श्री ठाकुर प्रताप सिंह जी का जन्म 1 फरवरी 1916 को मेरठ के हर्रा खिवाई ग्राम के उच्च क्षत्रिय कुल में हुआ। मेरठ क्षेत्र के प्रसिद्ध वकील ठाकुर कर्म सिंह एवं धर्मपरायण माता श्रीमती गंगा देवी की यह सन्तान जन्म से ही विलक्षण प्रतिभा की धनी एवं उच्च संस्कारों से युक्त थी। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा मेरठ में हुई, जिसमें उर्दू और अरबी भाषा का ज्ञान मुख्य था। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात्, वे उस समय की प्रतिष्ठित 'इम्पीरियल टोबैको' कम्पनी (सहारनपुर) में उच्च पद पर आसीन हुए, जो वर्तमान में आई.टी.सी. (I.T.C.) के नाम से जानी जाती है।
पारिवारिक जीवन: अपने पूज्य पिता का साया सिर से शीघ्र उठ जाने के कारण उनका बचपन अपनी धर्म-बुआ रानी ईश्वर कुमारी एवं विचित्र कुमारी (स्टेट चन्दसीना) के यहाँ बीता। अपने चाचा श्री रंजीत सिंह जी (जो पुलिस इंस्पेक्टर थे) की सहारनपुर तैनाती के समय, उनका विवाह श्रीमती शान्ती देवी जी के साथ हुआ, जो सहारनपुर के डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के वाइस चेयरमैन श्री धर्म सिंह राणा (कुतुबपुर) की सुपुत्री थीं।
वैराग्य एवं आध्यात्मिक यात्रा: नौकरी के राजसी ठाठ एवं गृहस्थ का आकर्षण उन्हें अधिक समय तक बाँधकर नहीं रख पाया। अपने सदगुरु श्री राजरतन जी के प्रथम दर्शन के बाद ही उनका मन गृहस्थ जीवन से विरक्त हो गया। धीरे-धीरे सदगुरु के प्रति बढ़ती अपार श्रद्धा के फलस्वरूप उन्होंने अपना जीवन उनके चरणों में समर्पित कर दिया तथा शेरपुर, मुजाहिदपुर, ईचोली एवं अन्य आश्रमों की सेवा में लीन रहे।
दिव्य अनुभूति एवं सकुण्डल का प्राकट्य: उनकी शिष्य साधना एवं श्रद्धा से प्रभावित होकर श्री सदगुरु ने उन्हें दिव्य-अन्तर्दृष्टि प्रदान की एवं उनके चोले में साकुण्डल परातम स्थित हुई। उन्हें यह आभास हो गया कि श्री सदगुरु के रूप में स्वयं परम पूज्य रतन बाई एवं पारब्रह्म ही धरती पर अवतरित हुए हैं। उनकी सामर्थ्य एवं भक्ति को परखने के बाद पारब्रह्म श्री राजरतन जी ने अपनी आध्यात्मिक धरोहर 'बीतक' तथा “अन्तिमेथैम” मंत्र प्रदान कर उन्हें आपापंथ धर्म के आदिगुरु, उद्घोषक एवं पथ-प्रदर्शक के रूप में स्थापित किया।
ज्ञान प्रसार एवं पारब्रह्म श्री राज जी की जाहिरी:
श्री रामरतन महाराज जी की इच्छा के अनुसार, उनके भौतिक देह त्यागने के पश्चात्, श्री सतगुरु सांकुण्डल बाई जी ने उन ब्रह्म-आत्माओं को लादुन्नी ज्ञान के माध्यम से जागृत करना आरंभ किया, जो श्री रामरतन महाराज जी को केवल एक आध्यात्मिक गुरु के रूप में देख रही थीं। श्री सतगुरु जी ने लादुन्नी ज्ञान के माध्यम से उन्हें यह बोध कराया कि जिन श्री रामरतन महाराज जी को वे अपना गुरु मानती रही, वही उनके प्रीतम पारब्रह्म श्री राज जी हैं।
अभूतपूर्व कार्य एवं साहित्यिक योगदान:
हमारे श्री सतगुरु जी का यह कार्य अपने आप में अत्यंत अभूतपूर्व एवं अलौकिक है। उन्होंने इन गूढ़ आध्यात्मिक विषयों को केवल मौखिक रूप से ही व्यक्त नहीं किया, बल्कि प्रमाणों सहित उन्हें स्पष्ट किया तथा इस 'लादुन्नी ज्ञान' को श्री रामरतन महाराज जी की बीतक, रुहानी बीतक और हमज़म ग्रंथ के रूप में लिखित स्वरूप प्रदान किया। इसके साथ ही, इस ज्ञान के विभिन्न पहलुओं को समझने और आत्मसात करने के लिए उन्होंने हजारों भजनों, वाणियों, गज़लों, लेखों और कविताओं की भी रचना की।
साधना, स्थापना एवं धाम-गमन: अकेले ही श्री सतगुरु जी ने संसार के आघातों और विषम परिस्थितियों के बावजूद, लगभग तीन दशकों की कठोर जाहिरी (साधना) के उपरांत, श्री सतगुरु ठाकुर प्रताप सिंह जी ने 'लादुन्नी ज्ञान' की दिव्य रश्मियों से पारब्रह्म श्री राज जी के अलौकिक स्वरूप को संपूर्ण जगत् के समक्ष उजागर एवं प्रतिष्ठित किया। मेरठ की पावन धरा पर 'परमात्मानन्द आश्रम' रूपी धाम की स्थापना कर, 15 जून 1997 को उन्होंने श्री राज जी को उस दिव्य परम-सिंहासन पर आसीन कराया, जो युगों-युगों से अपने स्वामी की प्रतीक्षा में रिक्त पड़ा हुआ था।