परमात्मानन्द सम्प्रदाय के संस्थापक श्री सतगुरु सांकुंडल बाई ठाकुर प्रताप सिंह जी ने इस जगत में एक ऐसा अद्वितीय आध्यात्मिक कार्य प्रकट किया, जो इससे पूर्व कभी नहीं हुआ था। उन्होंने परम सत्य के ज्ञान के साथ-साथ, प्रमाणों सहित समस्त ब्रह्मांडों, उनके स्वामियों तथा उनके वास्तविक स्वरूपों को भी स्पष्ट किया।
स्वामी श्री प्राणनाथ जी ने कुलजम स्वरूप के माध्यम से यह बताया कि ब्रह्मप्रियाएँ दुःख का खेल देखने परमधाम से मृत्युलोक में आईं। जिसका कारण उन्होंने बताया कि एक समय श्री राज जी ने उस सूक्ष्म पर्दे को हटा दिया, जो परमधाम और ब्रह्मप्रियाओं को अक्षरधाम से अलग रखता था। इसके पश्चात् ब्रह्मप्रियाओं के मन में अक्षरधाम के दुःख के खेल को देखने की इच्छा उत्पन्न हुई और इसी क्रम में उनका मृत्युलोक की ओर आगमन हुआ।
किन्तु इस घटना के पीछे वह मूल और गूढ़ महाकारण क्या था, जिसके कारण पारब्रह्म श्री राज जी ने अपनी उन ब्रह्मप्रियाओं को, जो सदा सत्, चित्, आनन्द, अनन्त और अद्वैत से परिपूर्ण रहती हैं, उन्हें दुःख के इस खेल को देखने का अवसर दिया? और स्वयं पारब्रह्म श्री राज जी को मृत्युलोक में क्यों आना पड़ा? इन सभी गूढ़ रहस्यों को श्री सतगुरु जी ने प्रकट किया।
उन्होंने कुलजम स्वरूप के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया कि मृत्युलोक में आगमन से पूर्व ब्रह्मप्रियाएँ योगमाया में हुए ब्रज और रास के दो दिव्य खेलों से होकर मृत्युलोक में जागनी और कयामी के खेल में आईं। श्री सतगुरु जी ने बताया कि ब्रज, रास और जागनी—इन तीनों खेलों का संबंध किसके साथ था। साथ ही, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अब कयामी ब्रह्मांड का खेल चल रहा है, जिसमें पारब्रह्म श्री राज जी को स्वयं मृत्युलोक में आना था। इस प्रकार, कुलजम स्वरूप में जिन विषयों का संकेत मिलता था, उनके पीछे छिपे गूढ़ कारणों, तथा ब्रज, रास, जागनी और कयामी के रहस्यों को श्री सतगुरु जी ने आगे खोलकर स्पष्ट किया।
हमारे श्री सतगुरु जी का यह कार्य अपने आप में अभूतपूर्व है। उन्होंने इन गूढ़ विषयों को केवल मौखिक रूप से नहीं बताया, बल्कि प्रमाणों सहित उन्हें स्पष्ट किया तथा इस लादुन्नी ज्ञान को हमजम ग्रंथ में लिखित रूप में प्रदान किया। इसके साथ ही, इस ज्ञान को उन्होंने हजारों भजनों, वाणियों और कविताओं के माध्यम से भी प्रकट किया, ताकि इस गूढ़ ज्ञान के विभिन्न पहलुओं को समझने और आत्मसात करने का मार्ग उपलब्ध हो सके।
श्री सतगुरु चरणों में कोटि नमन
सागर को स्याही करूँ, धरती को कागज़ मान,
वृक्षों की कलम बना लूँ, फिर भी न लिख पाऊँ गुणगान।
शब्द जहाँ थम जाएँ सारे, महिमा आपकी अपरम्पार,
ऐसे सतगुरु पाए हमने, धन्य हुआ यह जीवन-संसार।
जो कभी न देखा आँखों ने, उसका दर्शन करा दिया,
जो कभी न जाना जग ने, उसका भेद बता दिया।
ब्रह्मांडों के गूढ़ रहस्यों को, प्रमाण सहित समझा दिया,
परम सत्य का ज्ञान देकर, सत्य का मार्ग दिखा दिया।
श्री सांकुंडल बाई ठाकुर प्रताप, श्री सतगुरु रूप में आए,
लादुन्नी ज्ञान की अमृत-वाणी से, भूले जन जगाए।
जिनसे जाना अपना स्वरूप और जाना अपना धाम,
कोटि नमन श्री सतगुरु को, जिनसे सार्थक हुआ जीवन तमाम।
।। श्री सतगुरु साकुंडल ठाकुर प्रताप की जय।।